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कोरोना संक्रमण का कमाल, एक ही तराजू पर तौले जा रहे आम और खास

दया शंकर चौधरी

एक बात तो माननी पड़ेगी कि इस भरी दुनिया में अगर कोई भेदभाव नहीं कर रहा है तो वो है “कोरोना संक्रमण।” मेरे मोहल्ले के रिक्से वाले से लेकर साईकल पर घर घूम कर लोगों के दाढ़ी और बाल बनाने वाले राम विलास तक, मशहूर टीवी ऐंकर रोहित सरदाना, दूरदर्शन की मशहूर एंकर कनुप्रिया, बॉलीवुड और टेलीविजन के मशहूर अभिनेता बिक्रमजीत कंवरपाल तक सभी एक तराजू में तौले गये। इस महामारी में उत्तर प्रदेश सहित देश के अन्य हिस्सों में भी कलम के सिपाही पत्रकारों ने अपनी जान गंवाई है।

यदि कोरोना संक्रमण की सुनामी में गली गली घूम रहे पत्रकारों ने मरने वालों और सांस दर सांस मौत से लड़ने वालों की गिनती न बताई होती तो हम इस संक्रमण को सुनामी मान ही नहीं सकते थे। फिलहाल आज हम कोरोना संक्रमण से मरने वाले उन ‘वीर पत्रकारों को याद करेंगे, जिन्हें राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करने से चूक गये हैं।

अफसरों और मंत्रियों तक करीबी पहुंच रखने वाले लखनऊ के कई बड़े पत्रकारों को अस्पताल में इलाज नहीं मिल सका और उनकी मौत हो गई। कोरोना ने उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य सेवाओं को पूरी तरह एक्सपोज कर दिया है। इलाज के अभाव में क्या आम और क्या खास सभी दम तोड़ रहे हैं। सरकार से गुहार लगाने के बाद भी इलाज संभव नहीं हो पा रहा है। इन दिनों पत्रकार अपने आप को बहुत कमजोर और असहाय होता हुआ देख रहे हैं। हर दिन उनके एक साथी की मौत की खबर आती है और वो उनकी हिम्मत तोड़ देती है। ऐसे में इसे पत्रकारों की पेशागत मजबूरी ही कहा जाएगा कि वे हर समय खासतौर पर वायरस के संपर्क में आने के जोखिम में रहते हैं। उनमें से कुछ ऐसे फ्रीलांस पत्रकार और फोटो पत्रकार हैं जो सिर्फ घर पर बैठ कर ही काम नहीं कर सकते, उन्हें किसी भी समय घटनास्थल पर जाना ही पड़ता है।

अब सवाल उठता है कि इस भीषण संक्रमणकाल में क्या सरकार के पास कोरोना से मरने वाले पत्रकारों का प्रमाणिक ब्योरा है। क्या सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने संक्रमण से मरने वाले और बीमार पड़ने वाले पत्रकारों का ब्योरा एकत्रित करने का कोई ठोस उपाय विकसित किया है। क्या केन्द्र और प्रदेश स्तर पर सरकार की ओर से कोरोना से मरने वाले पत्रकारों के लिए कोई नीति निर्धारण करने की कोशिश की गई है। आने वाले दिनों में यदि विपक्ष ने संसद और विधान सभाओं में कोई सवाल उठा दिया तो क्या जवाब दिया जाएगा।

केंद्र सरकार ने प्रेस सूचना ब्यूरो (पीआईबी) के उस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है, जिसमें कोरोना वायरस के कारण देश में मारे गए पत्रकारों के परिवारों को 5-5 लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने की मांग की गई थी। इसके लिए (पीआईबी) ने अपनी वेबसाइट पर एक लिंक जारी किया है। जिस पर पत्रकार या उनके परिवार के लोग अपनी परेशानी लिखकर सरकार से मदद ले सकते हैं। जानकारी के मुताबिक केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने जर्नलिस्ट वेलफेयर कमेटी (जे डब्ल्यू सी) और देश भर के पत्रकारों को इस स्कीम में शामिल करने का फैसला किया है। इसके लिए अतिरिक्त फंड का इंतजाम भी किया गया है। याद रहे कि केन्द्र सरकार की ये स्कीम केवल केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा मान्यताप्राप्त पत्रकारों पर ही लागू होती है।ऐसी परिस्थिति में एडीटोरियल स्टॉफ, फोटोग्राफर, वीडियोग्राफर, कैमरामैन, तकनीशियन, टेक्निकल स्टॉफ और सहायक समेत फ्रीलांसर, डिजीटल, स्तंभकारों और पार्ट टाइमर पत्रकारों को केन्द्र सरकार की इस स्कीम में शामिल नहीं किया गया है।

ऐसे में सवाल उठता है कि सभी पत्रकारों को फ्रंटलाइन कर्मियों के रूप में घोषित किया जाना चाहिए। इतना ही नहीं बल्कि फ्रीलांसर, डिजीटल, स्तंभकारों और पार्ट टाइमर पत्रकारों को भी वैक्सीन देकर उन्हें प्रमाणपत्र देना चाहिए। प्रत्येक राज्य में स्थित प्रेस क्लाबों को कोविड केयर सेंटर के रूप में स्थापित करना चाहिए और कोरोना की वजह से अपनी जान गवाने वाले पत्रकारों के परिजनों को बिना किसी भेदभाव के मुआवजा भी मिलना चाहिए। याद रहे कि जमीनी पत्रकार यदि गली गली घूमकर तथ्य एकत्रित न करें, तो स्थिति की भयावहता का आंकलन नहीं किया जा सकता।

आइये फिलहाल हम आज अपने उन जांबाज पत्रकार साथियों को याद करते हैं जो अब कभी भी लौट कर घर वापस नहीं आ पायेंगे। जाने-माने एंकर रोहित सरदाना के बाद अब दूरदर्शन की मशहूर एंकर कनुप्रिया का कोरोना से निधन हो गया है। कनुप्रिया का दुनिया को अलविदा कहना मीडिया जगत के लिए बहुत बड़ा झटका है। कनुप्रिया की करीबी नोना वालिया ने उनकी मौत की पुष्टि की है। सोशल मीडिया पर उन्होंने कहा है कि कनुप्रिया अब हम सब के बीच नहीं रही हैं। कनुप्रिया ने भी दो दिन पहले ही सोशल मीडिया पर पोस्ट डाल कर कहा था कि वह अस्पताल में भर्ती हैं तथा उन्हें सभी की दुआओँ की जरूरत है। कनुप्रिया का ऑक्सीजन लैवल कम हो रहा था तथा उनका बुखार बढ़ रहा था और अन्ततः उनकी मौत की खबर ने मीडिया जगत को हिला दिया है। कनुप्रिया एंकर के साथ एक खूबसूरत अभिनेत्री भी थी।

बॉलीवुड और टेलीविजन के मशहूर अभिनेता बिक्रमजीत कंवरपाल का 52 साल की उम्र में कोरोना के चलते निधन हो गया। वो 52 वर्ष के थे। बिक्रमजीत कंवरपाल को कोरोना पॉजिटिव पाया गया था। उनका ट्रीटमेंट जारी था लेकिन वे कोविड से जंग हार गए। उनके निधन से फिल्म जगत में शोक की लहर है। जानी-मानी हस्तियां सोशल मीडिया के जरिए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर रही हैं। 2002 में इंडियन आर्मी से बतौर मेजर के पद से रिटायर होने के बाद उन्होंने साल 2003 में बॉलीवुड में कदम रखा था। उन्होंने ‘पेज 3, ‘कॉरपोरेट’, ‘मर्डर 2’, ‘आरक्षण’, ‘2 स्टेट्स’, ‘प्रेम रतन धन पायो’ जैसी फिल्मों में काम किया था।

उत्तर प्रदेश के आगरा शहर में कोरोना वायरस से एक पत्रकार पंकज कुलश्रेष्ठ की मौत होने का मामला अभी ताजा ताजा सामने आया है। वह स्थानीय दैनिक जागरण अखबार में उप-समाचार संपादक पद पर कार्यरत थे और पिछले कई दिनों से बुखार से ग्रस्‍त थे। लंबे समय से दैनिक जागरण में कार्यरत कुलश्रेष्‍ठ मथुरा में जिला प्रभारी भी रहे थे। वरिष्ठ खेल पत्रकार अजय शंकर तिवारी का 30 अप्रैल को गोरखपुर में कोरोना से निधन हो गया। उनका अंतिम संस्कार भी गोरखपुर में कर दिया गया। अजय शंकर पिछले सात दिनों से अस्पताल में भर्ती थे। वह 2015 से एक राष्ट्रीय समाचार पत्र के गोरखपुर संस्करण में डिप्टी न्यूज एडिटर के पद पर कार्यरत थे। उनकी पत्नी भी कोरोना से संक्रमित हो गई थीं। पिछले मंगलवार को उन्हें अस्पताल से डिस्चार्ज किया गया था। तीन सप्ताह पूर्व बनारस में अजय शंकर की मां का भी निधन हो गया था। अजय शंकर तिवारी न सिर्फ मंजे हुए खेल पत्रकार थे बल्कि एक कुशल ऑलराउंडर क्रिकेटर भी थे।

20 अप्रैल को दो पत्रकार मोहम्मद वसीम और मनीष की मौत हो गई थी तो 24 अप्रैल को भी एक पत्रकार की मौत हो गई है। 20 अप्रैल को लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार प्रेम प्रकाश सिन्हा (पीपी सिन्हा)* भी कोरोना के चलते काल के गाल में समा गये। वे नब्बे के दशक में दैनिक जागरण में कार्यरत थे। लखनऊ के विकास नगर में रहने वाले स्वतंत्र पत्रकार 65 वर्षीय विनय श्रीवास्तव कोरोना संक्रमित थे। प्राप्त जानकारी के अनुसार उनका आक्सीजन लेवल लगातार कम होते होते 52 पर पहुंच गया था। उन्होंने सीएम योगी आदित्यनाथ को ट्वीट करके मदद मांगी थी, क्योंकि कोई अस्पताल और डाक्टर उनका फोन नहीं उठा रहा था। उनके बेटे हर्षित श्रीवास्तव उन्हें लेकर लखनऊ के कई अस्पताल गए लेकिन उन्हें कहीं भी एडमिट नहीं किया गया। पाइनियर अख़बार की राजनीतिक संपादक ताविषी श्रीवास्तव की मौत भी कोरोना से 18 अप्रैल को हुई। ताविषी श्रीवास्तव भी सही समय पर इलाज़ न मिल पाने के अभाव में चली गईं। ताविषी घर पर एंबुलेंस का इंतजार करती रह गईं और जब एंबुलेंस पहुंची तो तब तक वो दुनिया को अलविदा कह चुकी थीं।

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हिमांशु जोशी भी कोरोना संक्रमण से मौत की भेंट चढ़ गए। हिमांशु जोशी का निधन 16 अप्रैल को टीएस मिश्रा अस्पताल में इलाज़ के दौरान हुआ। वे पिछले दिनों कोरोना से संक्रमित हुए थे और उनका इलाज़ चल रहा था। हिमांशु जोशी लखनऊ के एक वरिष्ठ पत्रकार थे साथ ही वे यूएनआई लखनऊ के ब्यूरो प्रमुख भी रह चुके थे। यही नहीं, दैनिक जागरण के पत्रकार 35 साल के अंकित शुक्ला की भी मौत कोरोना से हो गई।

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और उत्तर प्रदेश मुख्यालय मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के नवनिर्वाचित कार्यकारिणी सदस्य प्रमोद श्रीवास्तव व सहारा समय के पूर्व पत्रकार पवन मिश्रा भी कोरोना संक्रमण की चपेट में आकर मौत का शिकार बन गए। लखनऊ अमर उजाला के पत्रकार दुर्गा प्रसाद शुक्ला का भी कोरोना वायरस संक्रमण से निधन हुआ। लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार सच्चिदानंद गुप्ता ‘सच्चे’ का भी कोरोनावायरस के संक्रमण के कारण 14 अप्रैल को निधन हो गया। सच्चिदानंद सच्चे का निधन कोरोनावायरस से संक्रमित होने के दो दिन बाद ही हो गया था। सच्चिदानंद “सच्चे” जदीद अमल समाचार पत्र के संपादक थे।

लखनऊ के अलावा “हिन्दुस्तान” के आगरा एडिशन में कार्यरत 50 वर्षीय पत्रकार बृजेन्द्र पटेल का 19 अप्रैल को कोरोना से निधन हो गया।* कौशांबी में 38 वर्षीय पत्रकार शिवनंदन साहू की भी 10 अप्रैल को कोरोना से मौत हो गई।* बरेली के पत्रकार प्रशांत सक्सेना* भी कोरोनावायरस 20 अप्रैल को मौत के आगोश में समा गए। प्रशांत का इलाज़ दिल्ली के एक अस्पताल में चल रहा था , जहां इलाज़ के दौरान प्रशांत की मृत्यु हो गई। प्रशांत बरेली की फरीदपुर तहसील के रहने वाले थे।

कोरोना महामारी के इस दौर में तो अब मिर्ज़ा ग़ालिब की ज़ुबान में कहा जा सकता है…

रहिए अब ऐसी जगह चल कर जहां कोई न हो
हम-सुख़न कोई न हो और हम-ज़बां कोई न हो

बे-दर-ओ-दीवार सा इक घर बनाना चाहिए
कोई हम-साया न हो और पासबां कोई न हो

पड़िए गर बीमार तो कोई न हो तीमारदार
और अगर मर जाइए तो नौहा-ख़्वां कोई न हो

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