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5 जून विश्व पर्यावरण दिवस : छोटे-छोटे प्रयासों से बचाया जा सकता है पर्यावरण 

लाल बिहारी लाल

इस संसार में कई ग्रह एवं उपग्रह है पर पृथ्वी ही एक मात्र ऐसा ग्रह है जिस पर जीवन एवं जीव पाए जाते हैं धरती कभी आग का गोला था जलवायु ने इसे रहने लायक बनाया और प्रकृति ने मनुष्यों सहित समस्त जीवों, पेड़-पौधों का क्रमिक विकास किया। प्रकृति और जीव एक दूसरे के पूरक हैं। प्रकृति सत्य है। बिना प्रकृति के ना तो जीवन उत्पन्न हो सकता है और ना ही जीव । इसलिए प्रकृति मनुष्य को पर्यावरण संरक्षण की सीख देता है।

हमारा शरीर प्रकृति के पांच तत्वों से मिलकर बना है क्षितिज, जल, पावक, गगन, समीरा। पंचतत्व यह अधम शरीरा । इन पांच तत्वों के उचित अनुपात से ही चेतना (जीव) उत्पन्न होता है। धरती,आकाश,हवा,आग और पानी इसी के संतुलित अनुपात से धरती पर जीवन और पर्यावरण निर्मित हुआ है, जो जीवन के मूल तत्व है। आज बढ़ती हुई आबादी के दंश से पर्यावरण का संतुलन तेजी से बिगड़ रहा है और प्रकृति कूपित हो रही है।

प्रकृति के किसी भी एक तत्व का संतुलन बिगड़ता है तो इसका गहरा प्रभाव हमारे जीवन पर पड़ता है- मसलन बाढ़, भूस्खलन, भूकंप, ज्वालामुखी उद्गार सुनामी जैसी दैवीय आपदा सामने आती है । इस को ध्यान में रखकर सन 1972 में पर्यावरण के प्रति अमेरिका में 5 जून को चर्चा हुई और तब से लेकर अब तक हर साल 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस के रुप में मनाते आ रहे हैं। सन 1992 में 174 देशों के जनप्रतिनिधियों के पर्यावरण के प्रति चिंता व्यक्त करते हुए उसके समाधान के लिए ब्राजील के शहर रियो डी जनेरियो में पहला पृथ्वी सम्मेलन के तहत एक साथ बैठे ।

कलान्तर में 2002 में दक्षिणी अफ्रीकी शहर जोहन्सन वर्ग में दूसरा पृथ्वी शिखर सम्मेलन हुआ। जिसमें चर्चा हुई कि पर्यावरण बचाने की जिम्मेदारी सभी राष्ट्रों की है पर ज्यादा खर्चा धनी देश करेंगे । पर पिछले 20 सालों के सफर में कोई खास प्रगति नहीं हुई है समाज एवं सरकारी स्तर पर देश दुनिया में काफी प्रयास हो रहे हैं परन्तु या प्रयास तभी कारगर हो सकती है जब हर जन इसके लिए आगे आए । इसके लिए समाज में जागरूकता की कमी को दूर करना होगा तभी इसके सकारात्मक परिणाम मिल सकता है ।

हम और आप छोटे-छोटे प्रयास करके इस बिगड़ते हुए पर्यावरण को ठीक कर सकते हैं मसलन पानी की बर्बादी को रोकना। इसके लिए गाड़ी को सीधे नलके से धोने के बजाये बाल्टी में पानी भरकर गाड़ी को धोना। अपनें घरों में हो रहे पानी के लिकेज को रोकना, मोहल्लें में बिना टोटी के बहते पानी को रोकना,इसके लिए पड़ोसी को भी जागरुक करना। व्यक्तिगत वाहन के बजाये सार्वजनिक वाहन का उपयोग करना या फिर कार आदी को पूल करना।

अपने घरों में छोटे-छोटे पौधे को गमले में लगाना, कागज के दोनों तरफ लिखना, पुरानी किताबों को रद्दी में बेचने के बजाय किसी विद्यार्थी या पुस्तकालय को दान देना, डीजिटल बुक का उपयोग करना, घरों में आवश्यक रूप से बिजली के उपकरणों को उपयोग के बाद बंद कर देना आदि जैसे बहुत से छोटे-छोट प्रयास करके पर्यावरण को बचाया जा सकता है। इस तरह की पहल खूद करना होगा तभी कुछ बात बनेगी और पर्यावरण संरक्षण में अपनी भूमिका साबित कर सकते हैं और आने वाले पीढ़ी के लिए सुरक्षित बना सकते हैं।

पर्यावरण के घटक वायु के कारण दिल्ली सरकार दिल्ली में दो बार ओड और ईभेन का फार्मूला अपना चुकी है और पहली की तुलना में दूसरी कामयाब नहीं हो सकी। केन्द्र सरकार भी कई योजनाये बना चुकी है पर सही से कार्यान्वयन की कमी से इसका सकारात्मक परिणाम नहीं मिल पा रहा है। अगर अब भी पर्यावरण के प्रति सचेत नहीं हुए तो आने वाली पीढ़ी हमें कभी माफ नहीं करेगी। इसलिए पर्यावरण बचाने में अपनी भूमिका का निर्वाहन अवशय करे।

(लेखक – साहित्य टी.वी के संपादक है।)

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