राहुल और वरुण गांधी के लिए बेहद खास है सितम्बर 2022 का महीना

  दयाशंकर चौधरी

देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस के कर्णधार राहुल गांधी और भाजपा नेता वरुण गांधी के लिए सितम्बर का महीना बेहद खास है। इन दोनों नेताओं के लिए सितम्बर की 8 और 12 तारीख इस लिए महत्वपूर्ण है। क्योंकि इन्हीं तारीखों में इनके पूर्वज फिरोज जहांगीर गांधी का 8 सितम्बर को जन्मदिवस और 12 सितम्बर को पुण्यतिथि है।

बता दें कि फिरोज जहांगीर गांधी इन दोनों नेताओं के पूर्वज (दादा) थे। इनके लिए सितम्बर का महीना इसलिए भी खास है, क्योंकि इसी महीने की 10 तारीख से 16 सितम्बर तक पितृपक्ष भी है, जिसमें हिन्दू परम्परानुसार पितरों का श्राद्ध किया जाता है। सम्भवतः राहुल और वरुण को हिन्दू परम्परा के अनुसार अपने पितरों का श्राद्ध भी करना होगा।

राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा: ये बात अलग है कि 7 सितंबर से कांग्रेस की ‘भारत जोड़ो’ यात्रा श्रीपेरुम्बदूर से शुरू हो गई है, जिसका नेतृत्व राहुल गांधी कर रहे हैं। बताते चलें कि श्रीपेरुम्बदूर एक ऐसी ऐतिहासिक जगह है जहां राहुल के पिता और पूर्व पीएम राजीव गांधी की हत्या हुई थी। यहां एक स्मारक बना है, जो नेहरू-गांधी वंश की विरासत का प्रतीक है।

राहुल गांधी ने ‘भारत जोड़ो यात्रा’ की शुरुआत श्रीपेरंबदूर से की थी। वह यहां पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के स्मारक पर एक प्रार्थना सभा में शामिल हुए थे। यहीं पर तीन दशक पहले एक आत्मघाती हमला करके राजीव गांधी की हत्या कर दी गई थी। पिता के स्मारक पर आयोजित प्रार्थना सभा में शामिल होने के बाद कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष ने कन्याकुमारी में एक कार्यक्रम में हिस्सा लिया था जहां तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन ने उन्हें राष्ट्र ध्वज सौंपा था।

11 सितंबर को केरल पहुंचेगी यात्रा

पदयात्रा 11 सितंबर को केरल पहुंचेगी और अगले 18 दिनों तक विभिन्न राज्यों से होते हुए 30 सितंबर को कर्नाटक पहुंचेगी, और उसके बाद उत्तर की तरफ अन्य राज्यों में जाएगी। पार्टी ने राहुल समेत 119 नेताओं को “भारत यात्री” नाम दिया है जो कन्याकुमारी से पदयात्रा करते हुए कश्मीर तक जाएंगे। ये लोग कुल 3570 किलोमीटर को दूरी तय करेंगे।

भारत जोड़ो यात्रा का रास्ता

भारत जोड़ो यात्रा के रास्ते पर नजर डालने से पता चलता है कि कुछ महत्वपूर्ण बिंदु छूट रहे हैं। उदाहरण के लिए, यात्रा काफी हद तक सुरक्षित क्षेत्र से होकर गुजरेगी, जहां कांग्रेस को भीड़ जुटाने की उम्मीद है। यह राजस्थान पर केंद्रित है, जहां कांग्रेस सत्ता में है। वहीं, पंजाब और हरियाणा में भारत जोड़ो यात्रा सिर्फ अंबाला से गुजरेगी। यात्रा अपने पहले चरण में ओडिशा और पूर्वोत्तर राज्यों को छोड़ रही है। अगर इतिहास देखें, तो नेताओं की यात्राओं ने कठिन या चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों से गुजरने पर पार्टी का हौसला बढ़ाया है। यहां कांग्रेस ने मौका गंवा दिया है।

अनिश्चित पथ: भारत जोड़ो यात्रा को लेकर दो महत्वपूर्ण घटनाएं हैं, जो इस यात्रा के रास्ते में मुश्किलें पैदा कर सकती हैं। एक, कांग्रेस पार्टी का आंतरिक चुनाव और दूसरा, गुजरात और हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव।

बावजूद इसके अपने राजनीतिक हितों की रक्षा के लिए कांग्रेस ने सारी तैयारियां कर ली हैं। कांग्रेस नेताओं को उम्मीद है कि 7 सितंबर से शुरू हो रही ‘भारत जोड़ो’ यात्रा कांग्रेस पार्टी से देशवासियों के साथ ही कांग्रेस नेताओं को भी जोड़ेगी। कन्याकुमारी से कश्मीर तक 35,000 किमी से अधिक की दूरी तय करने के लिए इस यात्रा का नेतृत्व राहुल गांधी कर रहे हैं। इस यात्रा को लेकर नेताओं का कहना है कि कांग्रेस को एकमात्र ऐसी पार्टी के रूप में पेश करने का विचार है, जो राष्ट्र को एक साथ लाने के लिए संकल्पित है।

एक चिंता यह भी है कि क्या लोग और स्वयंसेवक यात्रा में शामिल होंगे? या यह केवल पार्टी नेताओं के यात्रियों तक सीमित रहेगा? अगर ऐसा हुआ तो यह भारत जोड़ो यात्रा करने के उद्देश्य को विफल कर देगा। दरअसल, कांग्रेस इसे जन आंदोलन बनाना चाहती है। साथ ही, अगर यह यात्रा राहुल गांधी और कांग्रेस के भाग्य को नहीं बढ़ाती है, तो पार्टी एक बहुत बड़ा मौका एक बार फिर खो देगी। अगर यात्रा के बीच में कांग्रेस चुनाव हार जाती है, तो यह राहुल गांधी और उनके वापस आने की क्षमता पर सवाल खड़े करेगी।इतिहास में यात्राएं अक्सर उन लोगों के लिए कारगर रही हैं, जिन्होंने इसे किया है। जैसे एनटीआर की चैतन्य रथम यात्रा, जगन मोहन रेड्डी की संकल्प यात्रा, ममता बनर्जी की सिंगूर और नंदीग्राम की यात्रा आदि। अब आते हैं अपने मूल विषय पर, जिसमें राहुल के पूर्वजों के प्रति उनके कर्तव्यों की चर्चा की जाएगी।

स्वतंत्रता सेनानी और पत्रकार थे राहुल के पूर्वज फिरोज गांधी

स्वतंत्रता सेनानी और पूर्व सांसद फिरोज गांधी का जन्म 12 सितंबर 1912 को हुआ था, जबकि 8 सितंबर 1960 को हार्ट अटैक के कारण महज 48 साल की उम्र में उनका निधन हो गया था।

ये उल्लेखनीय है कि सम्भवतः राहुल गांधी अपने पूर्वज फिरोज गांधी की पुण्यतिथि (8 सितंबर) पर श्रद्धांजलि देने उनकी समाधि पर नहीं पंहुचे थे।

भारत की पूर्व पीएम इंदिरा गांधी ने 1942 में फिरोज गांधी से शादी की थी

फिरोज और इंदिरा गांधी की मुलाकात मार्च 1930 में हुई थी, जब आजादी की लड़ाई में एक कॉलेज के सामने धरना दे रही कमला नेहरू बेहोश हो गई थीं। उस समय फिरोज गांधी ने उनकी देखभाल की थी। कमला नेहरू को टीबी की बीमारी हो जाने के बाद फिरोज भुवाली के टीबी सैनिटोरियम में उनके साथ रहे और जब कमला इलाज के लिए यूरोप गईं तो वहां भी वो उन्हें देखने पहुंचे।

1936 को जब कमला नेहरू का निधन हुआ तब भी फिरोज गांधी वहां मौजूद थे। लेकिन उस दौर में भी अर्न्तजातीय विवाह बड़ी बात थी, इस रिश्ते के लिए इंदिरा के पिता जवाहर लाल नेहरू तैयार नहीं थे, फिर भी इंदिरा ने पिता की मर्जी के खिलाफ मार्च 1942 में शादी कर ली। तब महात्मा गांधी ने इंदिरा और फिरोज को अपना सरनेम गांधी दिया। इसके बाद जवाहर लाल नेहरू ने भी इस रिश्ते को अपनी मंजूरी दे दी।

फिरोज़ गांधी ने खोली थी आजादी के बाद के सबसे बड़े घोटाले की पोल

फिरोज गांधी ने 1957 में लोकसभा में मुंधड़ा-एल.आई.सी घोटाले का मामला जोरदार ढंग से उठाया था। इस कांड में प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के खास करीबी और
तत्कालीन केंद्रीय मंत्री टी. टी. कृष्णामाचारी को इस्तीफा देना पड़ा था। उससे पहले फिरोज गांधी ने एक अन्य बड़े उद्योपति के भ्रष्टाचार का मामला उठाया और उस उद्योगपति को जेल जाना पड़ा था।

मुंधड़ा घोटाला आजादी के बाद का सबसे बड़ा घोटाला था जिसके कारण एक मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा था। दरअसल एल. आई. सी ने कलकत्ता के व्यापारी हरिदास मुंधड़ा की एक कंपनी के एक करोड़ 26 लाख रुपए मूल्य के शेयर खरीद लिए थे, जबकि उस कंपनी की कोई साख नहीं थी। इससे एल.आई.सी को 37 लाख रुपए का घाटा हुआ। शेयर खरीदते समय अन्य किसी कंपनी को ऐसा अवसर नहीं दिया गया। एल. आई. सी ने मुंधड़ा कंपनी से व्यक्तिगत तौर पर बातचीत की और उसके शेयर खरीद लिए। ऐसा उच्चस्तरीय साठगांठ के तहत किया गया था। लाइफ इंश्योरेंस ऑफ इंडिया एक्ट, 1956 पास करवाने के पीछे भी फिरोज गांधी की महत्वपूर्ण भूमिका थी।

फिरोज गांधी ने 16 दिसंबर 1957 को लोकसभा में अपना यादगार भाषण दिया। इस प्रकरण के बाद जवाहर लाल नेहरू से फिरोज गांधी का संबंध पहले से भी अधिक खराब हो गया।

हार्ट अटैक से हुई थी मौत

फिरोज गांधी राजनीति के साथ-साथ एक पत्रकार के रूप में भी जाने जाते थे। वे “नेशलन हेराल्ड व नवजीवन” समाचार पत्र के संपादक रहे। आजादी के पहले आम चुनाव में वो रायबरेली से पहली बार सांसद चुने गए और 1960 तक लोकसभा में रायबरेली का प्रतिनिधित्व करते रहे। हालांकि समय के साथ फिरोज और इंदिरा के बीच संबंध बिगड़ता चला गया। फिरोज और इंदिरा दिल्ली में अलग-अलग रहते थे। 1958 में उन्हें पहली बार दिल का दौरा पड़ा और 1960 में दूसरे दौरे को फिरोज गांधी झेल नहीं सके और 8 सितम्बर को उनका निधन हो गया।

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