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…लेकिन नीतीश ही बनेंगे मुख्यमंत्री!

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जिस तरह से पाला बदला है, उस लिहाज से उन्हें भारतीय लोकतंत्र में  मौकापरस्त, सत्ता-पिपासु या विचारहीन नेता करार दिए जा सकता है। सही कहा जाए तो आज तक उनके जनता दल-यू को चुनावी बहुमत नहीं मिला, लेकिन 2000 के बाद वह आठवीं बार मुख्यमंत्री बने हैं। इसका मतलब है कि जनादेश भले ही राजद या भाजपा के पक्ष में रहा हो, लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश ही होंगे! वह 2005 से लगातार बिहार के मुख्यमंत्री हैं, लेकिन राज्य अभी भी विकास और सम्पन्नता के मामले में शून्य पर है।
राजद, कांग्रेस, वामपंथी दलों के साथ फिर गठबंधन हुआ है, तो नीतीश को ‘समावेशी मुख्यमंत्री’ माना जा रहा है। बेशक वह ईमानदार होंगे, परिवारवाद से मुक्त होंगे और सुशासन बाबू भी उन्हें माना गया होगा, लेकिन अब छवियों के ये लबादे फट चुके हैं। अब ऐसे मुखौटे उतार दिए गए हैं। लोगों को नीतीश स्वीकार्य नहीं, बल्कि उनके प्रति गहरा मोहभंग महसूस किया जा सकता है। 2020 के विधानसभा चुनावों के जनादेश से ही यह स्पष्ट है। कृपा रही प्रधानमंत्री मोदी की, जिनके साथ गठबंधन ने नीतीश की नैया पार लगा दी और 45 विधायक जीत कर आ सके।

अब बात नीतीश और भाजपा से अलग होने की, तो उन्होंने जनादेश को धोखा दिया है। यह उनकी पुरानी राजनीतिक आदत है। खासकर युवाओं में नीतीश के खिलाफ खासा आक्रोश और गुस्सा है, क्योंकि किसी भी स्तर पर उनकी सरकार युवाओं को फायदा नहीं पहुंचा पाई। रोजग़ार और नौकरी बुनियादी तौर पर राज्य के विषय हैं।

यदि बिहारी लोगों को राज्य के बाहर रिक्शा चलाने, मजदूरी करने, खेतिहर मजदूर बनने के मौके ना मिलते, तो न जाने उनकी आर्थिक दुर्दशा क्या होती? नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक बिहार के 51 फीसदी से ज्यादा लोग गरीब या गरीबी-रेखा के नीचे हैं। खासकर शिक्षा, स्वास्थ्य और कुपोषण के मामले में बिहार की स्थिति दयनीय है। इतना ही नहीं नीतीश की सरकार बाढ़ की त्रासदी को भी कम करने के बंदोबस्त नहीं कर पाई।

ऐसी ढेरों विसंगतियां हैं, जो बिहार के साथ आज भी फेविकोल की तरह चिपकी हैं। इन सबके बावजूद नीतीश को ‘सुशासन बाबू’ का तमगा दिया गया! नीतीश बिहार की गरीबी, दुर्दशा और विसंगतियों से नहीं लड़ पाए, लेकिन उन्हें ‘महान राजनेता’ जरूर आंका जाता रहा है, क्योंकि बिहार के राजनीतिक समीकरण ही ऐसे हैं। 2017 में जब नीतीश राजद से अलग हुए थे, तो उन्होंने भ्रष्टाचार के मामलों को लेकर लालू परिवार को कटघरे में खड़ा किया था।

क्या आज वो सभी सवाल और मामले खत्म हो गए? क्या लालू और उनके परिवार पर लगा दाग, दूध की तरह सफ़ेद हो गया है? यह एक यक्ष प्रश्न है। इसका जवाब न तो खुद नितीश के पास है और न ही लालू के पास! फिर भी बिहार में ‘महागठबंधन’ के साथ एकबार से ‘सुशासन बाबू’ की सरकार है।

कब कब बने मुख्यमंत्री

पहली बार- तीन मार्च 2000- मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, लेकिन सात दिनों बाद 10 मार्च 2000 को पद से इस्तीफा दे दिया क्योंकि बहुमत साबित नहीं कर पाए। इस दौरान भाजपा के साथ उनका गठबंधन था।

दूसरी बार- 24 नवंबर 2005- मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। कार्यकाल पूरा करने के बाद 24 नवंबर 2010 को इस्तीफा दिया। इस दौरान भाजपा का गठबंधन रहा।

तीसरी बार- 25 नवंबर 2010- चुनाव जीतने के बाद भाजपा के साथ गठबंधन कर मुख्यमंत्री बने। 2014 में पीएम पद के लिए मोदी का नाम आने से भाजपा से अलग हो गए, लेकिन लोकसभा चुनाव में हार के बाद 19 मई 2014 को मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया। जीतन राम मांझी को सीएम बना दिया।

चौथी बार- 22 फरवरी 2015 को मांझी को हटाने के बाद मुख्यमंत्री बने। इस दौरान राजद, कांग्रेस का बाहर से समर्थन था।

पांचवीं बार- 20 नवंबर 2015 को विधानसभा चुनाव में राजद और कांग्रेस के साथ गठबंधन किया। जीतने के बाद सीएम बने।

छठी बार- 27 जुलाई 2017 को महागठबंधन से अलग होकर भाजपा के साथ सरकार बनाई और सीएम बने।

सातवीं बार- 25 नवंबर 2020- भाजपा के साथ गठबंधन कर विधानसभा चुनाव लड़ा था और जीतने के बाद सीएम बने।

आठवीं बार- 10 अगस्त 2022- भाजपा का साथ छोड़कर राजद, कांग्रेस और अन्य पांच पार्टियों के सहयोग से सरकार बनाया।

1951 में स्वतंत्रता सेनानी के घर जन्मे थे नीतीश कुमार। घर में मुन्ना नाम से पुकारे जाने वाले नीतीश ने बचपन की पढ़ाई-लिखाई के बाद पटना का रूख किया लेकिन राजनीति के लिए नहीं बल्कि इंजीनियरिंग के लिए। उन्होंने पटना इंजीनियरिंग कॉलेज से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री ली, लेकिन शायद नीतीश की किस्मत में कुछ और ही लिखा था। मैकेनिकल इंजीनियरिंग के बाद उनकी राजनीतिक परवरिश जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया, कर्पूरी ठाकुर और जॉर्ज फर्नांडिज जैसे राजनीतिक शख्सियतों के बीच होने लगी। धीरे-धीरे नीतीश कुमार राजनीति में आ ही गए।

1977 में राजनीतिक करियर की शुरुआत  :- नीतीश ने अपने राजनीतिक करियर की शुरूआत 1977 में की। जनता पार्टी के टिकट पर नीतीश ने पहला विधानसभा चुनाव लड़ा, लेकिन सफलता नहीं मिली। 1985 में वे जनता पार्टी के ही टिकट पर विधानसभा पहुंचे। इसी बीच 1987 को नीतीश कुमार बिहार के युवा लोकदल के अध्यक्ष बनाए गए। धीरे-धीरे नीतीश का कद बढ़ता गया और 1989 को नीतीश कुमार को जनता दल (बिहार) का महासचिव बना दिया गया।

1989 में पहली बार लोकसभा सदस्य चुने गए :- साल 1989 नीतीश ने पहली बार लोकसभा के लिए चुने गए। एक साल बाद 1990 में अप्रैल से नवंबर तक नीतीश कृषि एवं सहकारी विभाग के केंद्रीय राज्य मंत्री रहे। साल 1991 में 10वीं लोकसभा के चुनाव में एक बार नीतीश को जीत मिली और वे संसद में जनता दल के उपनेता बने। साल 1996 में नीतीश कुमार 11वीं लोकसभा के लिए भी चुने गए। साल 1998 ने नीतीश फिर से 12वीं लोकसभा के लिए चुने गए। 1998-99 तक नीतीश कुमार अटल बिहारी की सरकार में केंद्रीय रेलवे मंत्री भी रहे। साल 1999 में 13वीं लोकसभा में भी नीतीश को जीत मिली और वे केंद्रीय कृषि मंत्री बनाए गए।

राजनीतिक करियर का टर्निंग प्वाइंट 

साल 2000 नीतीश कुमार पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने। उनका कार्यकाल 3 मार्च से 10 मार्च 2000 तक यानी मात्र सात दिन तक चला। इसके बाद नीतीश की एक बार फिर केंद्र में वापसी हुई और साल 2000 में नीतीश एक बार फिर से केंद्रीय कृषि मंत्री बनाए गए। साल 2001 में नीतीश को रेलवे का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया। साल 2001 से 2004 तक नीतीश केंद्रीय रेलमंत्री रहे। साल 2002 के गुजरात दंगे भी नीतीश कुमार के कार्यकाल के दौरान हुए थे।

2005 से लगातार बिहार की राजनीति में सक्रिय 

2004 में नीतीश 14वीं लोकसभा के लिए चुने गए। एक साल बाद साल 2005 में नीतीश कुमार एक बार फिर से मुख्यमंत्री बने। बतौर 31वें मुख्यमंत्री नीतीश का ये कार्यकाल 24 नवंबर 2005 से 24 नवंबर 2010 तक चला। 25 नवंबर 2010 को नीतीश कुमार एक बार फिर से मुख्यमंत्री बने। इसके बाद 22 फरवरी 2015, 20 नवंबर 2015, 27 जुलाई 2017 और 25 नवंबर 2020 को नीतीश ने बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। नीतीश ने 10 अगस्त को आठवीं बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।

     अनुपम चौहान

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