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Dalit Harassment : एक्ट और इसके दुरूपयोग

देखा जाता है की सरकार लोगो के हित में कुछ नियम, कुछ अधिनियम के जरिये जनता की सुरक्षा करने का प्रयास करती है। किन्तु आज कल या ये कहें की बीते कुछ वर्षो से बड़े पैमाने पर इसका दुरूपयोग हो रहा। ऐसा ही कुछ हो रहा Dalit Harassment एक्ट के साथ भी।

Dalit Harassment एक्ट : उपयोग या दुरूपयोग

सरकार समाज में उत्पीड़न को रोककर पीड़ित को न्याय दिलाने के लिए समय समय पर नियम अधिनियम एवं कानून बनाती रहती है लेकिन कभी-कभी कुछ लोग कानून को खिलवाड़ बनाकर उसका दुरपयोग करके अपना उल्लू सीधा करने लगते हैं।

एक समय था जबकि दहेज प्रथा पर रोक लगाकर पीड़िता को न्याय दिलाने के लिए सरकार ने दशकों पहले दहेज एक्ट कानून बनाया था लेकिन इसका दुरूपयोग इस कदर होने लगा कि पूरे देश में हाहाकार मच गया और बेगुनाह होते हुए भी लोगों को सालों परिवार के साथ जेल काटनी पड़ी।

इस कानून से विवाहिता महिलाओं की हिम्मत इतनी बढ़ गयी कि जरा जरा सी बात पर वधू और उसके मायके वाले दहेज उत्पीड़न का मुकदमा दर्ज कराने की धमकी देकर ब्लैकमेल करने लगे थे। सुलह करने के नाम पर सौदे होने लगे और स्थिति इस कदर भयावह हो गयी कि लोग इस कानून की डर से बहुत घबराने लगे।

दहेज़ एक्ट का ही स्वरुप बनता दलित

दलितों की रक्षा के लिए दहेज एक्ट की ही तरह दलित उत्पीड़न एक्ट बनाया गया और पीड़ित को नकद सहायता देने की भी व्यवस्था की गई। परिणाम यह हुआ कि सरकारी आर्थिक सहायता लेने के नाम फर्जी दलित उत्पीड़न के मुकदमें दर्ज होने लगे और बेगुनाह जेल जाने लगे जिससे लोगों में भय पैदा हो गया। बसपा की दूबारा सामान्य वर्ग के लोगों के साथ बनी सरकार ने पहली बार इसमें थोड़ी शिथिलता दी थी और जाँच के बाद मुकदमा दर्ज करने की बात कही गई थी।इसके बावजूद कुछ लोगों ने इसे कमाई का जरिया बना लिया और फर्जी दलित उत्पीड़न की शिकायतों का दौर जारी है।

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जरा जरा सी बात पर दलित उत्पीड़न के मुकदमें दर्ज हो रहे । एक लम्बे समय से महसूस किया जा रहा कि दहेज एक्ट की तरह अनुसूचित जाति जनजाति प्रताड़ना निवारण अधिनियम का दुरपयोग हो रहा है इसके बावजूद राजनैतिक बलि का बकरा बनने की डर से कोई सरकार पहल नहीं कर पा रही। यह कानून बदला लेने का हथियार जैसा बन गया और इसकी आड़ में दुश्मनी अदा की जाने लगी।इस कानून से समाज में वैमनस्यता फैल रही और सरकारी धन का दुरपयोग हो रहा।ऐसा नहीं है कि उत्पीड़न नही होता है लेकिन उत्पीड़न की घटनाएं यदा कदा होती हैं और समाज के सभी वर्गों के साथ होती है।

सुप्रीम कोर्ट की तरफ से की गयी पहल

इस दिशा में परसों सुप्रीम कोर्ट की तरफ से की गयी पहल स्वागत योग्य एक कदम माना जा रहा है। सर्वोच्च अदालत ने कहा कि प्रताड़ना की शिकायत मिलते ही मुकदमा दर्ज करके गिरफ्तारी करने की जगह पहले शिकायत की जांच की जाय। अदालत ने साफ कर दिया है कि सक्षम अधिकारी से जांच सिर्फ सरकारी कर्मचारियों अधिकारियों के मामले में ही नहीं बल्कि आम नागरिकों की शिकायतों पर कराने के बाद ही अगली कार्यवाही की जाय। अदालत ने कहा है कि एक्ट का दुरपयोग होने का अंदाजा गत 2016 में हुयी शिकायतो से लगाया जा सकता है। इन शिकायतों में पाँच हजार से ज्यादा शिकायतें झूठी पायी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इन नियमों का पालन न करने वाले पुलिस कर्मियों के खिलाफ अनुशासनात्मक और न्यायालय की अवमानना की कार्यवाही की जाए।

सुप्रीम कोर्ट का यह ऐतिहासिक हस्तक्षेप समाजिक क्षेत्र की समरसता बनाये रखने की दिशा में अनूठीं पहल है।

रिपोर्ट- भोलानाथ मिश्र

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