कहानी : मनमौजी की दुकान

              आशुतोष

गाँव की नुक्कड के ठीक सामने मेवा लाल की एक छोटी सी दुकान थी,जहां सुबह दोपहर शाम प्रायः भीड़ लगी रहती थी। मीना लाल, जो एक साधारण परिवार का था प्राइवेट राइस मील में सिर्फ 8000 की नौकरी करता था, लेकिन घर की नौकरी थी, किसी तरह गुजारा हो जाता था। वह नित ही मेवालाल की दुकान पर आता था। वहाँ विभिन्न तरह के लोग और विभिन्न मुद्दो पर बात चलती रहती थी। मीना लाल बोलने में माहिर जाना जाता था। उसकी पकड़ देश के विभिन्न मुद्दों पर अच्छी थी। सभी लोग उसे सुनना चाहते थे।

आज मेवा लाल की दुकान पर जीएसटी कर स्लैब की बात चल रही थी। सभी चाय की चुस्कियों के साथ अपने-अपने विचार रख रहे थे। चर्चा गर्मागर्म चल रही थी।

एक सज्जन ने कहा- कर तो ठीक है पर आमलोगो से क्यूँ?आज भी ऐसे लोग हैं, जिनके पास दो वक्त के लिए आटा-चावल खरीदने के पैसे नही होते, वो अतिरिक्त कर बोझ कैसे पे करेगे। फिर दूसरे सज्जन ने कहा भैया ये तो सरासर गलत है। थाली से पहले प्याज गायब हुई, फिर दाल, फिर सब्जी और अब रोटी और चावल। क्या यही सोच कर हम वोट किये थे? अब बर्दाश्त से बाहर है भैया। फिर तीसरे सज्जन ने कहा भाय, यह सरकार है हवा के भी कर वसूल सकती है। पहले हम अंग्रेज के गुलाम थे, अब लगता है सरकारों की गुलामी कर रहे हैं। सरकार हम लोगों को कब समझेगी?

मीना लाल सभी की बाते सुनकर बोला- देखो भैया सब नियम पुराने और घिसे पिटे हैं। समय बदल रहा है। बदलाव तो हर चीज में हो ही रहा है, लेकिन आम जन को आर्थिक कष्ट देकर यह विकास की गंगा नहीं बहायी जा सकती! सरकारों तक हम लोगों को अपनी बात पुरजोर तरीके से रखना होगा। सरकारों को हमारी मजबूरी को समझना होगा ।

इस देश का विकास आम लोगो की खुशहाली से ही संभव है।सरकारो को आम लोगो की जेबों पर अतिरिक्त कर बोझ डालकर, कोरोना से भी गंभीर बीमारी दे दी है, जिसे झेल पाना सबकी बस की बात नहीं होगी।

कृषि प्रधान देश में कृषि से तैयार खाद्यान्न पर अतिरिक्त कर देकर आमजन की रसोई में चोर दरवाजे से पहुंचना क्या सरकार की सही नीति है? ये समझ से परे है। क्या अन्न पर कर देना सही है या अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण? यह किसी भी दृष्टिकोण से अच्छा नही है। इससे अच्छा होता विलासिता सम्बन्धी चीजों पर टैक्स का दायरा बढा देते? प्रत्येक इंसान को टैक्स के दायरे में लाना कहाँ तक उचित है?

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