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योगी का समरसता संदेश

भारतीय दर्शन में मानव कल्याण का संदेश दिया गया। बिना किसी भेदभाव के सर्वे भवन्तु सुखिनः की कामना की गई। उपासना पद्धति के आधार पर विभाजन की रेखा नहीं खिंची गई। इसमें कभी संकुचित विचारों को महत्व नहीं दिया गया। समय-समय पर अनेक संन्यासियों व संतों ने इस संस्कृति के मूल भाव का सन्देश दिया। सभी ने समरसता के अनुरूप आचरण को अपरिहार्य बताया। योगी आदित्यनाथ ने ऐसे उदार चिन्तन को समझने का संदेश दिया। उन्होने कहा कि भारतीय मनीषा ने धर्म को कभी उपासना विधि के साथ जोड़कर नही देखा। आस्था और उपासना पद्धति पृथक हो सकती है। भारतीय मनीषा ने इसके लिए कभी भी किसी को बाध्य नहीं किया. समभाव और समरसता का मार्ग दिखाया। सभी को जोड़ने का कार्य किया गया।

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भगवान श्रीराम ने उनसे बहुत पहले त्रेतायुग में उत्तर से दक्षिण को जोड़ने का कार्य किया। उत्तर से दक्षिण तक जो सीमा भगवान श्रीराम ने हजारों वर्ष पूर्व तय की थी, वहीं सांस्कृतिक सीमा आज भारत की राजनीतिक सीमा के रूप में है। द्वादश ज्योतिर्लिंगों के माध्यम से भगवान शिव ने पूरे भारत को एकता के सूत्र में जोड़ने का कार्य किया। समाजवादी डॉ राम मनोहर लोहिया के विचार प्रासंगिक हैं। उन्होने कहा था कि श्रीराम कृष्ण तथा शिव के प्रति जब तक भारत की आस्था बनी रहेगी, तब तक दुनिया की कोई भी ताकत भारत का किसी भी प्रकार का नुकसान नहीं कर पाएगी।

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योगी आदित्यनाथ दीक्षान्त समारोह में विद्यार्थियों से संवाद कर रहे थे. उन्होने कहा कि तैत्तिरीय उपनिषद में समावर्तन का दीक्षा उपदेश अत्यन्त विस्तृत रूप से रेखांकित किया गया है, ‘सत्यं वद धर्मं चर’ अर्थात सत्य बोलना है और धर्म का आचरण करना है। माहौल के अनुरूप योगी ने राष्ट्रीय स्वाभिमान और समरसता का व्यापक संदेश दिया. कहा कि हमारे शिक्षण केन्द्रों का बोध वाक्य ‘आ नो भद्राः कृतवो यन्तु विश्वतः’ रहा है। अर्थात ज्ञान जहां से भी आए, उसके लिए सभी दिशाओं को खुला रखो।

यह नहीं कहा गया कि हमारे किसी ग्रन्थ में ही दुनिया का सारा ज्ञान है। भारतीय मनीषा ने कभी भी अपनी बात को दूसरे पर थोपने का प्रयास नहीं किया। भारत के किसी भी प्रतिष्ठित गुरुकुल में यह नहीं कहा गया कि जो वहां पढ़ाया जा रहा है, वह ही सबसे अच्छा है। बल्कि उन्होंने माना कि जहां से भी ज्ञान प्राप्त हो सकता है, उसे अंगीकार करते हुए अपने जीवन का हिस्सा बनाये।

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उन्होंने कहा कि दुनिया जब अन्धकार में जी रही थी, तब भारत में प्रतिष्ठित गुरुकुल एवं नालन्दा तथा तक्षशिला जैसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय उत्कृष्ट अध्ययन और अध्यापन के केन्द्र थे. ये दुनिया को नई राह दिखा रहे थे। आज हमारे सामने अपने पुरातन गौरव को पुनर्स्थापित करने की चुनौती है। इसके लिए सरकार और समाज मिलकर कार्य करना होगा। अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस भारतीय विरासत का सम्मान है। योग में अनेक समस्याओं का समाधान करने की क्षमता है।

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यह विज्ञान को उस स्थिति तक पहुंचाने में सक्षम है, की सीमाएं समाप्त होती हैं। भारतीय मनीषा इस सीमा से आगे गई है। यही अध्यात्म है। योगी ने कहा कि भारतीय परम्पराओं को अंगीकार करते हुए विज्ञान की सीमाओं का अतिक्रमण कर जब आप आगे बढ़ेंगे, तो आपके सामने एक विस्तृत संसार होगा। आप इसका भौतिक दृष्टि से नहीं बल्कि अंतःकरण की दृष्टि से ही अवलोकन कर पाएंगे।

रिपोर्ट-डॉ दिलीप अग्निहोत्री

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